मदर एक्सप्रेस रायपुर रेलवे स्टेशन पर

 भारतीय रेल, नोबल पुरस्कार से सम्मानित मदर टेरेसा की जन्मशती के अवसर पर ‘मदर एक्सप्रेस’ नामक प्रदर्शनी गाड़ी चला रही हैं। मदर एक्सप्रेस का उद्देश्य मानवता के संदेश और मदर के त्याग की गाथा का प्रचार करना है
शेखर झा 
मटर टेरेसा के बारे में लोग अच्छे से नहीं जानते। अधिकतर लोग मदर टेरेसा से जुड़ी काफी चीजों से वाकिफ भी नहीं है। शनिवार को रायपुर के रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म एक ए पर मदर एक्सप्रेस आई। उस ट्रेन को देखने के लिए शहर के सभी स्कूल के  स्टूडेंट्स पहुंचे। इस ट्रेन को मदर टेरेसा के सौ वें जन्मदिन के अवसर पर 26 अगस्त, 2010 को कोलकाता के सियालदह स्टेशन से रेल मंत्री ममता बेनर्जी ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया था। इस ट्रेन में मदर टेरेसा के जन्म से लेकर मृत्यु तक की पूरी जानकारी सम्मिलित की गई है। रायपुर के रेलवे स्टेशन पर ये ट्रेन दो दिन रहेगी। ये ट्रेन महान विभूति के जीवन और उनके लोकोपकारी कार्यों की झांकी दर्शाती है।
छ; डिब्बे एक्सप्रेस में
मदर एक्सप्रेस ट्रेन में छह डिब्बे हंै उसमें से तीन डिब्बों में मदर टेरेसा से जुड़ी सभी जानकारियां हंै। तीन डिब्बों में ट्रेन में सफर करने वाले लोग रहते हैं। ट्रेन के पहले बोगी में मदर टेरेसा के जन्म व शिक्षा के बार में, दूसरी बोगी में सामाजिक कार्यों के बारे में व तीसरे बोगी में मृत्यु व पुरस्कारों के बारे में जानकारी प्रदान की गई है। मदर एक्सप्रेस ट्रेन के इंचार्ज चंद्रशेखर प्रयाद वर्मा ने बताया कि इस ट्रेन को देश के सभी राज्यों तक ले जाना है। इस ट्रेन के आने से सभी लोग मदर टेरेसा से जुड़ी चीजों को नजदीकी से जान पाएंगे।  इस टेÑन को देखने के लिए स्कूल व कॉलेज के बच्चे काफी संख्या में स्टेशन पहुंचे।
 एक हफ्ते रहेगी ट्रेन छत्तीसगढ़ में 
मदर एक्सप्रेस रायपुर रेलवे स्टेशन पर 30 जनवरी तक रुकेगी, इसके बाद दुर्ग रेल्वे स्टेशन पर 31 व 1, बिलासपुर रेलवे स्टेशन पर 2 व 3 फरवरी तक और अंत में रायगढ़ रेलवे स्टेशन पर 4 फरवरी तक मदर एक्सप्रेस ट्रेन रुकेगी। उल्लेखनीय है कि मदर एक्सप्रेस ट्रेन विगत छ: महीनों में 83 स्टेशनों से होकर गुजर चुकी है। 26 फरवरी 2011 बिहार के कटिहार रेलवे स्टेशन पर इसकी यात्रा समाप्त होगी।  
 पहले कोच में जन्म, शिक्षा
 मदर टेरेसा का जन्म मैसेडोनिया के राजधानी स्कोपिया में 26 अगस्त को 1910 में हुआ था। मदर टेरेसा के पिता का नाम निकाला बोयाजू व माता का नाम द्राना बोयाजू था। उनके माता-पिता ने उनका नाम गोंझा अग्नेंस रखा था। 12 वर्ष की उम्र में उनको लगा कि उन्हें धर्म प्रचारक (मिशनरी) बनना है, 1928 में उन्होंने अपना घर छोड़ा और कैथलिक नन बन गर्इं। उन्होंने अपना नाम बदलकर टेरेसा रख लिया। इसके बाद वो आईरिश संस्था ‘दि सिस्टर्स आॅफ लोरेट्टो’ में शामिल हो गर्इं। भारत में मिशनरी कार्य को बढ़ावा देने के लिए उनको 6 जनवरी 1929 को कलकत्ता भेज दिया गया। जहां उनको सेंट मेरी हाई स्कूल में अध्यापिका के पद नियुक्त किया गया। सिस्टर्स टेरेसा 24 मई 1937 को मदर टेरेसा बनीं। 1948 में अपने सुपीरियर की अनुमति से उन्होने स्कूल को छोड़ कर कलकत्ता की झुग्गियों में रहने वाले गरीबों की सेवा में अपने को आपको समर्पित कर दिया।
दूसरे कोच में मिशनरीज आॅफ चेरिटीस 
7 अक्टूबर 1950 को मदर टेरेसा ने अपना संगठन दि मिशनरी आॅफ चैरिटि को प्रारंभ करने के लिए होली सी से अनुमति प्राप्त की। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों की प्रेमपूर्वक देखभाल करना था जिनकी देखभाल करने के लिए कोई तैयार नहीं था। 1990 तक  इसमें 40 से अधिक देशों में एक मिलियन से अधिक स्वयंसेवी बने।
तीसरे कोच में मदर के जीवन के अंतिम वर्ष
अपने जीवन के अंतिम वर्ष में कई स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद मदर टेरेसा ने गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा और समाज व चर्च के प्रति कार्य जारी रखे। मदर टेरेसा के निधन से मानवता को भारी क्षति पहुंची। 87 वर्ष की आयु में 5 सितंबर 1997 को कलकत्ता में उनका निधन हो गया।

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