जरा इन बातो पर ध्यान दे

शेखर झा 

कुछ विचित्र सी खबरें पढ़ने को मिलती हैं। खबर यह होती है कि अमूक विद्यार्थी ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसे अच्छी अँगरेजी नहीं आती थी। यह भी खबर पढ़ने को मिलती है कि उसने आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसकी प्रेमिका ने उसे ठुकरा दिया या प्रेमी से उसकी शादी नहीं हो सकी। यह पढ़कर न केवल गहरा दुःख होता है, बल्कि धक्का सा पहुँचता है।
दुःख इसलिए होता है कि एक ऐसा जीवन जिसे इस धरती ने अपनी गोद में 18-20 साल रखा। जिसे प्रकृति ने अपनी हवा, पानी और रोशनी से पाला-पोसा, वह यूँ ही एक मिनट में इन सबको ठुकराकर इतना अधिक निर्दयी बनाकर एक मिनट में चलता बना। वह कुछ बनकर इस धरती को और बेहतर बनाने में जो अपना योगदान दे सकता था, उस संभावना को उसने अपने जीवन की समाप्ति के साथ ही समाप्त कर दिया। धक्का मुझे इसलिए लगता है कि मैं सोचता हूँ कि क्या इतने अमूल्य, इतने महत्वपूर्ण और इतने असाधारण जीवन को ऐसी छोटी-छोटी बातों के लिए खत्म कर दिया जाना चाहिए? कम से कम मैं तो इससे इत्तफाक नहीं रख पाता। हो सकता है कि मेरी इस बात से मेरे युवा साथी सहमत न हों, क्योंकि उन्हें प्रेम की सफलता और असफलता जिंदगी की एक बहुत बड़ी बात मालूम पड़ती है। इसलिए वे इसके लिए मरने और मारने की बात को एक प्रकार से अपने अस्तित्व से ही जोड़कर देखने लगते हैं।
उन्हें लगता है कि यदि प्रेम ही नहीं रह गया तो जिंदगी के रहने का अर्थ ही क्या है। और समाज में ऐसे भावुक युवा प्रेमियों को समझा पाना इतना आसान भी नहीं होता। ऐसे कई लोगों से मेरा साबका पड़ा है और मैंने समझाने की इस परेशानी को झेला भी है। मैंने पाया है कि उनके सारे सच के केंद्र में उनकी अतिरिक्त भावुकता होती है।
यदि उनकी इस भावुकता पर तार्किकता की थोड़ी सी भी लगाम कसी जा सके तो ऐसी न जाने कितनी जिंदगियों को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। यहाँ तक कि बहुत सी ऐसी भी जिंदगियाँ होती हैं, जो नष्ट तो नहीं होती, लेकिन अपने उस खोए हुए प्यार को अपने दिल में दबाए हुए अपने लिए लगातार बर्बादी के रास्ते तलाशती रहती है। ये जितना बेहतर जीवन जी सकते थे, अपने-आपको उस बेहतर जीवन से वंचित कर लेते हैं।

मित्रों सातवें दशक के एक बहुत खूबसूरत फिल्मी गीत की पंक्तियाँ हैं-
छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए
यह मुनासिब नहीं जिंदगी के लिए।
 प्यार से भी जरूरी कई काम हैं
प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए।


प्यार बहुत कुछ तो हो सकता है, लेकिन सब कुछ कतई नहीं। और यदि सच पूछिए तो प्रेम केवल तभी तक प्रेम रहता है, जब तक कि वह आपको मिलता नहीं। जैसे ही प्रेम मिल जाता है, यानी कि प्रेमिका पत्नी और प्रेमी पति बन जाता है, जैसे ही प्रेम उड़न-छू हो जाता है। स्पष्ट है कि जब प्रेमी प्रेमी नहीं रहा और प्रेमिका प्रेमिका नहीं रही, तो फिर भला प्रेम ही प्रेम कैसे रह सकता है। मैं जानता हूँ कि मेरी इस बात पर सौ प्रश प्रेम-प्रेमिका भरोसा नहीं करेंगे, क्योंकि इस पर भरोसा करने के लिए अनुभव की जरूरत होती है और यदि एक बार अनुभ वहो जाए तो फिर आप भरोसा करें या न करें उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता।
इसलिए फिलहाल तो मैं अपने युवा मित्रों से यही कह सकता हूँ कि कृपया यकीन करें। साथ ही एक बात और। जिंदगी के किसी भी क्षेत्र की सफलता का परिणाम आप अपने जीवन के अंत में क्यों ढ़ूँढते हैं? आपको लगता होगा कि यह जिंदगी आपकी है और आप इसके साथ जैसा चाहें, बर्ताव कर सकते हैं।
यदि आप ऐसा सोचते हैं कि जो गलत सोचते हैं, क्योंकि यह जिंदगी आपकी होकर भी आपकी नहीं है। यह ईश्वर और प्रकृति के द्वारा आपके पास रखी गई एक धरोहर मात्र है। आप इसके केवल रखवाले भर हैं। जिस तरह एक चौकीदार उस घर का मालिक नहीं हो जाता जिसकी वह रखवाली कर रहा है, उसी तरह आप भी अपने शरीर के मालिक नहीं है, जिसको आप पाल-पोस रहे हैं। आपके माँ-बाप ने इसको तैयार किया है और पूरी प्रकृति और पूरा समाज मिलकर इसके अस्तित्व को बनाए रखने में इसकी मदद कर रहा है। इसलिए किसी व्यक्ति को यह अधिकारी नहीं होता कि वह ईश्वर की इस धरोहर को नष्ट कर दे।
मित्रों जीवन में कभी ऐसा नहीं होता कि रास्ते खत्म हो जाते हैं। रास्ते खत्म नहीं होते; हाँ, वे मुड़ सकते हैं। बड़े रास्ते छोटी पगडंडियाँ बन सकती हैं। लेकिन वे मरती कभी नहीं। जिंदगी हमेशा संभावनाओं से भरा हुआ एक विशाल कर्मक्षेत्र होता है जहाँ एक दरवाजा बंद होने पर सौ दरवाजे खुलने की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
आपको करना केवल यह होता है कि अपने आँखों के आँसुओं को पोंछकर आँखें उठाकर आशा भरी नजरों से क्षितिज को निहारना होता है और आपके देखते ही देखते न जाने कितने दरवाजे उन्मुक्त हो जाते हैं। इसलिए उदास, निराश और हताश होने की कोई जरूरत ही नहीं होती।

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Comment by Tina Sachdev on February 26, 2011 at 2:29pm
Brillinat Post !! Hum aapse sehmat hai Shekhar ji

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