मधुक एक ठोप (मैथिली कथा) - जितमोहन झा...

कुरुक्षेत्रक भीषण रक्तपातक बाद, अपन सभ पुत्र गवाँ चुकल शोकसँ संतृप्त धृतराष्ट्रक दुःख विदुरक समक्ष अश्रुधाराक रूपमे बहि निकललनि ! तखन ओऽ सेविका पुत्र (विदुर) हुनका समक्ष वर्तमान स्थितिक अनुकूल एक उपदेशात्मक नीति-कथाक वर्णन केलखिन !

विदुर कहलखिन "आइ एकटा ब्राह्मणक कथा अपनेकेँ बताबैत छलहुँ ! जे जंगली पशुसँ भड़ल जंगलमे पथ - भ्रमित भऽ गेलखिन रहए ! शेर आर चिता, हाथी आर भालूक चीख, चिंघाड़, आर गर्जनक एहन दृश्य जे मृत्युक देवता, यमोक मोनमे सिहरन पैदा कऽ दैतियनि! ब्राह्मणोकेँ ओऽ वातावरण डरा देलकनि रहए! हुनकर सम्पूर्ण शरीर भयसँ थरथराइत रहनि ! हुनकर मस्तिष्क आशंकासँ भरल रहनि आर हुनकर भयभीत मोन कुनू देवताकेँ व्याकुल भए तकैत रहनि, जे हुनकर प्राणकेँ भयावह वनचरसँ बचाऽ सकतियनि ! लेकिन ओइ बर्बर जानवरक गर्जनासँ सम्पूर्ण जंगल प्रतिध्वनित भऽ कs हुनकर उपस्थितिक आभास करबैत रहनि !ब्राह्मणकेँ एहन प्रतीत होइ छ्लनि की जतए-जतए ओ जाइत छथिन, जानवरक गर्जना हुनकर प्रतिच्छाया बनि कए हुनकर पीछा करैत छ्लनि !
 
अचानक हुनका लागलनि की ओऽ भयावह जंगल एक घन जाल बुनि कs हुनका आर डरा रहलनि-ए! जंगलक गहनता एक डराओन स्त्रीक रूप धरि, अपन दुनु हाथ पसारि कs हुनका अपनामे विलीन करएक निमंत्रण दऽ रहलनि-ए!जंगलक बीचमे एकटा इनार रहनि जे घास आर बड़का-बड़का लत्तीसँ झाँपल रहए ! ओऽ ओही इनारमे खसि गेलखिन आर लत्तीक सहारासँ कुनू पाकल आम जेकाँ लटपटा कs माथक भर उलटा लटकि गेलखिन ! हुनका लेल डरक बादल गहींर भेल जाइत रहनि! इनारक तलमे ओऽ एक राक्षसी सांप देखलथि, इनारक मुंडेर पर एक बड़का हाथी जकर छः मुँह आर बारह पैर रहनि , ओ मंडरबैत रहए ! आर लत्तीक बीचमे बनल मधुमाछीक छत्ताक चारू दिस विशालकाय मधुमाछी ओकर भीतर-बाहर भिनभिनाबैत रहए !

मधुमाछीक छत्तासँ टपकै बला मौधक किछु ठोप लटकल ब्राह्मणक मुँह पर खसलनि ! ओइ लटकल परिस्थितियोमे ओऽ ब्राह्मण शहदक ओऽ बूंद केँ नञि छोड़लखिन ! जतेक बूंद गिरैत रहनि, हुनका ओतेक संतोष प्राप्त होइत रहनि ! मुदा हुनकर इच्छा शांत नञि होइत रहनि ! ओऽ आर जीवित रहए लय चाहैत रहथिन ! जखन ओऽ शहदक मज़ा लैत रहथि तखने ओऽ देखलखिन की जै लत्ती पर ओऽ लटकल रहथिन ओइ लत्तीकेँ किछु उज्जर आर कारी मूषक (मूस) अपन धरगर दांतसँ काटि रहलनि-ए! हुनकर भय आर बढ़ि गेलनि ! ओऽ भयसँ चारूदिस घिरि गेलथि, कखनो हुनका मांसाहारी जानवरक भय, तँ कखनो डराओन स्त्री, राक्षसी सांप तँ कखनो ओइ लत्तीक भय होइत रहनि जकरा मूषक (चूहा) अपन दांतसँ कुतरैत रहए। भएक एहि बहावमे ओऽ माथक बल लटकल छथि ! अपन आशाक संग , मधुक रसास्वादक तीव्र आकांक्षा लऽ कs ओइ जंगलमे हुनका जीवित रहबाक आर प्रबल इच्छा रहनि!

विदुर धृतराष्ट्रसँ कहैत छथिन " ई जंगल एक नश्वर संसार अछि; एहि संसारक भौतिकता एक इनार आर अंधकारमय इनारक चारू दिसक स्थान कुनू व्यक्ति विशेषक जीवन चक्रकेँ कs दर्शाबैत अछि ! जंगली पशु रोगक प्रतीक अछि तँ डराओन स्त्री नश्वरताक द्योतक !

इनारक नीचां बैसल विशालकाय सांप ओऽ काल अछि, जे समयकेँ लीलए लऽ पर्याप्त अछि ! एक वास्तविक आर संदेहरहित विनाशकक तरह ! लत्तीक मोह - पाशमे ब्राह्मण लटकल छथि जे स्वरक्षित जीवनक मूल प्रवृति छथि, जकरासँ जीव बाँचल नञि अछि ! इनारक मुंडेर पर छः मुखी हाथीक प्रतीक ई अछि, छः मुख अर्थात छः ऋतु आर बारह पैर माने सालक बारह मास ! लत्तीक कुतरए बला मूस ओऽ दिन राति अछि, जे मनुष्यक आयुकेँ अपन धरगर दाँतसँ कुतरि-कुतरि कs कम क्ऽ रहल अछि ! यदि मधुमाछी हमर सबहक इच्छा अछि तँ मधुक एक बूंद ओऽ तृप्ति जे इच्छामे निहित अछि ! हम सब मनुष्य इच्छाक अथाह समुद्रमे शहद रूपी काम-रसक भोग करैत डूबि-उतरि रहलहुँ-ए!

एहि तरहेँ विद्वान लोक जीवन चक्रक व्याख्या केने छथि, आर ओकरासँ मुक्तिक उपाएसँ अवगत करेने छथि!!

 

लेखक: जितमोहन झा (जितू)

मैथिल आर मिथिला (ब्लॉग व्यवस्थापक)

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